How Emotions Are Made in Hindi – 2012 में अमेरिका के एक स्कूल सडीह हुक में जबरदस्त फायरिंग हुई जिसमें 20 बच्चों समेत 26 लोग मारे गए। कुछ दिन बादकनेक्टिकट के गवर्नर ने टीवी पर स्पीच दी। शुरुआत में उन्होंने सबको धन्यवाद बोला। लेकिन जब न्यू टाउन की घटना पर आए तो उनकी आवाज भर आई। उनकी आवाज लड़खड़ाते ही मेरी आंखों में आंसू आ गए। कैमरा भीड़ की तरफ घूमा तो और लोग भी रो रहे थे। उस वक्तगवर्नर भी बोलना रोक कर नीचे देखने लगे। ऐसे इमोशंस बहुत बेसिक लगते हैं। जैसे हर इंसान के अंदर यह पहले से ही भरे होतेहैं। ऐसा लगता है जैसे यह अपने आप अपने टाइम पर बाहर आ जाते हैं। किसी के चेहरे पर मुस्कान या रोना या आवाज में बदलाव
देखकर हम आसानी से इमोशंस पहचान लेते हैं। साइंस में इसे क्लासिकल व्यू कहा जाता है। इस हिसाब से जब गवर्नर की आवाज टूटी तोमेरे दिमाग में सैडनेस सर्किट एक्टिव हुआ। मेरी आइब्रोस सिकुड़ गई, चेहरा उतर गया और मैं रोने लगी। दिल की धड़कन तेज हो गई,सांसे बढ़ गई और शरीर में कई और बदलाव आए।
इमोशंस (Emotions) की असली समझ क्या है?
ऐसा माना जाता है कि हर इमोशन का अपना एक अलग पैटर्न होता है। जैसे सैडनेस का, एंगरका, फियर का वगैरह। यह माना जाता है कि यह इमोशंस हमारे डीएनए में फिट हैं। हर इंसान के अंदर एक जैसे होते हैं। पूरी दुनिया में, हर कल्चर में।यानी जो सैडनेस मैं महसूस करती हूं वैसी ही सबको होती है। क्लासिकल व्यू के हिसाब से इमोशंस अपने आप आ जाते हैं और कभी-कभी
हमारी सोच से टकराते हैं जिसे गुस्से में हम बॉस को कुछ सुनाना चाहते हैं। पर दिमाग कहता है ऐसा मत करिए। यह आईडिया बहुतपुराना है। प्लेटो, अरिस्टोटलल, बुद्ध, डार्विन, फ्रॉयड सब ने इसको माना था। आज भी साइकोलॉजी की किताबों में यही मिलताहै। टीवी शोज़, मूवीज और यहां तक कि बच्चों के स्कूल्स में भी यही सिखाया जाता है। कई सरकारी सिस्टम जैसे कोर्ट, मेडिसिन यहांतक कि एफबीआई भी इस क्लासिकल व्यू को मानते हैं। मानते हैं कि इमोशंस हमारे एनिमल नेचर का हिस्सा है और अगर हमकंट्रोल ना करें तो हमसे गलत काम हो सकते हैं। लेकिन असल में ढेर सारे साइंटिफिक प्रूफ हैं कि क्लासिकल व्यूज सच नहीं है।

बहुत रिसर्च के बाद भी कोई भी इमोशन का परमानेंट फिंगरप्रिंट नहीं मिला। कभी-कभी गुस्से में ब्लड प्रेशर बढ़ता है कभीनहीं। फियर बिना एमग्डिला के भी महसूस हो सकता है। कभी-कभी चेहरा बदलता है कभी नहीं। अब सवाल यह है इमोशंस असल में हैंक्या?
जब साइंटिस्ट क्लासिकल व्यू छोड़कर असली डाटा देखते हैं तो एक बिल्कुल अलग कहानी निकलती है। इमोशंस हमारे अंदर पैदा नहींहोते। हम उन्हें बनाते हैं। यह हर कल्चर में अलग होते हैं। यह अपने आप नहीं आते। हम खुद उन्हें क्रिएट करते हैं। हमारेशरीर, दिमाग, माहौल और हमारी परवरिश से मिलकर बनते हैं। इमोशंस असली हैं लेकिन वैसे जैसे पैसे असली होते हैं। हम सबमिलकर मानते हैं तो असली बन जाते हैं। इसको थ्योरी ऑफ कंस्ट्रक्टेड इमोशंस कहते हैं। जैसे गवर्नर की स्पीच में जब उनकी आवाजटूटी तो मेरे अंदर कोई सैडनेस सर्किट ट्रिगर नहीं हुआ।
मेरी परवरिश और एक्सपीरियंस की वजह से। मेरे दिमाग नेप्रेडिक्ट किया कि ऐसे मौके पर मेरे शरीर में क्या फीलिंग्स होंगी जैसे दिल की धड़कन, आंसू, पेट में गांठ यह सब मेरेदिमाग ने मिलाकर सैडनेस बना दी। अगर प्रेडिक्शन अलग होती तो वही फीलिंग्स, गुस्सा या डर बन सकती थी। और कभी-कभी वहीफीलिंग्स खुशी या थैंकफुलनेस भी बन जाती है। शायद यह बात सुनने में अजीब लगे या समझ ना आए लेकिन ऐसा ही है। मैं भी साइंटिस्ट
होते हुए अपने इमोशंस को वैसे ही महसूस करती हूं जैसे सब लोग। जिसे क्लासिकल व्यू कहता है। लेकिन सच यह है कि इमोशंस ट्रिगरनहीं होते बल्कि बनाए जाते हैं। क्लासिकल व्यू अब भी पॉपुलर है क्योंकि वह बहुत नेचुरल और सिंपल लगता है। वह हमें जवाबदेता है कि हम कहां से आए हैं? हमारे इमोशंस कितने जरूरी हैं और हम सच में क्या महसूस कर रहे हैं। थ्योरी ऑफ कंस्ट्रक्टेड इमोशन इन सवालों
के बिल्कुल अलग जवाब देती है। यह बताती है कि इंसान खुद अपने इमोशंस बनाता है। वह भी अपने दिमाग, शरीर, परवरिशऔर कल्चर से मिलकर। यह थ्योरी आपको खुद को और दूसरों को एक नए तरीके से देखने की नजर देती है। क्यों जरूरी है कि हम कौन सी थ्योरी माने?क्योंकि क्लासिकल व्यू पर भरोसा करना कई बार हमारी जिंदगी पर असर डालता है। जैसे एयरपोर्ट पर जब सिक्योरिटी वाले आपकेचेहरे या हावभाव देखकर जज करते हैं कि आप झूठ बोल रहे हैं या नहीं। एक बार अमेरिका में ऐसे प्रोग्राम पर 900मिलियन खर्च कर दिया। लेकिन कुछ साबित नहीं हुआ। डॉक्टर्स भी क्लेसिकल व्यू की वजह से औरतों और मर्दों की बीमारियों को अलग
तरीके से समझते हैं। जिससे कई बार औरतों की जान चली जाती है। इमोशंस को सही से समझना बहुत जरूरी है। यहां तक कि गलत इमोशन पढ़ने की वजह सेकभी-कभी जंग भी शुरू हो जाती है। इराक वॉर में ऐसा ही हुआ था। हमारी समझ में अब एक रिवोल्यूशन आ रहा है। हम इमोशन, दिमाग और इंसान को बिल्कुल नएतरीके से देख रहे हैं। जैसे फिजिक्स और बायोलॉजी में हुआ था। अब इमोशंस की दुनिया में भी वैसी ही क्रांति आ रही है।
सवाल है कि यह इमोशंस बनते कैसे हैं?क्यों हर बार एक जैसे नहीं होते?1980 में मैंने सोचा था कि मैं क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट बनूंगी। मैंने यूनिवर्सिटी ऑफ वाटर लू में पीएचडी शुरू की थी। मेराप्लान था कि आगे चलकर पेशेंट्स का इलाज करूंगी। मुझे लगा था कि मैं बस साइंस का यूजर बनूंगी ना कि कोई बड़ा बदलाव लानेवाली साइंटिस्ट। लेकिन जिंदगी में अक्सर कुछ अलग हो जाता है। ग्रेजुएट स्कूल में पहली बार मुझे क्लासिकल व्यू पर डाउट हुआ। उस वक्त मैंलो सेल्फ एस्टीम और उससे जुड़े ए्जायटी और डिप्रेशन पर रिसर्च कर रही थी। बहुत सारे एक्सपेरिमेंट्स में देखा गया थाकि जब लोग खुद के बनाए स्टैंडर्ड्स पर फेल हो जाते हैं तो डिप्रेशन महसूस करते हैं। जब दूसरों के स्टैंडर्ड्स पर फेल होते हैंतो ए्जायटी आती है। मैंने भी अपना पहला एक्सपेरिमेंट इसी को दोहराने के लिए किया जिसमें वलंटियर से पूछा कि उन्हें ए्जायटीया डिप्रेशन महसूस हो रही है या नहीं। यह एक्सपेरिमेंट बहुत आसान होना चाहिए था। लेकिन रिजल्ट बिल्कुल अलग है। वालंटियर्सने वैसे जवाब नहीं दिए जैसा उम्मीद थी। मैंने दूसरा एक्सपेरिमेंट भी दोहराया लेकिन फिर भी फेल। तीन साल में मैंने आठ बार कोशिश की और हरबार नतीजे उम्मीद के उल्टे मिले। साइंस में एक्सपेरिमेंट फेल हो सकते हैं।
लेकिन लगातार आठ बार फेल होना यह अजीब था। मुझेलगा शायद मैं साइंटिस्ट बनने लायक नहीं हूं। जब मैंने ध्यान से डाटा देखा तो पता चला कि ज्यादातर सब्जेक्ट्स एंग्जायटी औरडिप्रेशन के बीच फर्क ही नहीं कर पा रहे थे। ज्यादातर लोगों ने दोनों का एहसास या तो साथ में बताया या बिल्कुल नहीं बताया।जबकि असल में यह दोनों इमोशंस अलग-अलग फील होती है। मगर डाटा कुछ और कह रहा था। असल में मेरा एक्सपेरिमेंट फेल नहीं हुआथा बल्कि मुझे असली खोज मिली थी। लोग अक्सर ए्जायटी और डिप्रेशन के बीच फर्क नहीं कर पाते। अगले सात बार भी यही रिजल्टआया। मैंने और दूसरे साइंटिस्ट के डाटा में भी यही पैटर्न देखा। पीएचडी के बाद जब मैं प्रोफेसर बनी तो औरभी रिसर्च की। हमने बहुत सारे लोगों से हफ्तों या महीनों तक उनके इमोशनल एक्सपीरियंस पर नजर रखवाई। सिर्फ ए्जायटीया डिप्रेशन ही नहीं बल्कि बाकी इमोशंस भी देखी। इस नई रिसर्च में पता चला कि हर कोई एंग्री, सैड, अफ्रेड जैसे शब्द यूज करताहै। लेकिन सबका मतलब एक जैसा नहीं होता। कुछ लोग बहुत डिटेल में फीलिंग्स बताते हैं। तो कुछ लोग सैड, अफ्रेड, एशियस,डिप्रेस्ड इन सबको बस मुझे डर लग रहा है। आई फील अनप्लेज़ेंट के लिए यूज करते हैं। खुशियों वाले इमोशंस में भी यही फर्कदिखा। 700 से ज्यादा अमेरिकन सब्जेक्ट्स में यह वेरिएशन देखा गया। जैसे एक इंटीरियर डिजाइनर अलग-अलग ब्लू केशेड्स पहचान सकता है।
लेकिन कोई आम इंसान सबको बस ब्लू ही कहेगा। इसी तरह इमोशंस में भी डिटेलिंग को इमोशनल ग्रेनुलरिटीकहते हैं। क्लासिकल व्यू के हिसाब से इमोशनल ग्रेनुलेरिटी का मतलब है कि अपने अंदर के इमोशंस को सही से पहचानना। यानी अगर कोईजॉय, सैडनेस, फियर जैसे शब्द अलग-अलग यूज करता है तो वह अपने फिजिकल सिग्नल्स को सही से पहचान पा रहा है। अगर कोई एशियस औरडिप्रेस्ड को एक जैसा मानता है तो वह यह सिग्नल्स पहचान नहीं पा रहा। मैंने सोचा क्या लोगों को उनकी इमोशनलग्रेनुलरिटी बढ़ाने के लिए ट्रेन किया जा सकता है? यानी क्या मैं सिखा सकती हूं कि अपने इमोशंस को सही से पहचाने?इसके लिए जरूरी था कि मैं इमोशन को ऑब्जेक्टिव तरीके से नाप सकूं। जैसे फिजिकल पैटर्न से पता चल सके कि कोई वाकई
एशियस है या डिप्रेस्ड या कुछ और। साइकोलॉजी की किताबों में लिखा है कि हर इमोशन का अपना खास फिजिकल पैटर्न होता है।जैसे फिंगरप्रिंट। जैसे आपकी उंगलियों के निशान वैसे ही हर इमोशन का भी पैटर्न माना गया है। मतलब अगर कोई सैड है या हैप्पी है तो उसके फेस,बॉडी और ब्रेन में एक खास पैटर्न दिखेगा। मुझे लगा कि इन इमोशन फिंगरप्रिंट से मैं इमोशंस को नाप सकती हूं। लेकिन असल में सबकुछ उल्टा निकला। क्लासिकल व्यू के अनुसार चेहरा इमोशन को ऑब्जेक्टिव और सही तरीके से मापने की चाबी है। डार्विन ने भी यही कहा था कि इमोशंस
और उनके एक्सप्रेशनंस हर इंसान में एक जैसे हैं। यानी हर कोई बिना सीखे फेस एक्सप्रेशनंस से इमोशन पहचान सकता है।इसलिए मैंने सोचा कि लैब में चेहरों की मूवमेंट्स मापी जाए और पता किया जाए कि लोग अपने इमोशंस को सही से पहचानते भी हैंया नहीं। इंसान के फेस में 42 छोटे-छोटे मसल्स होते हैं। जिनसे अलग-अलग एक्सप्रेशनंस बनते हैं। जैसे आंख मारना, स्माइल करना याआइब्रोस को सिकोड़ना। कई बार चेहरा शान भी लगता है, लेकिन मसल्स फिर भी एक्टिव होते हैं। क्लासिकल व्यू के हिसाब से हर इमोशन का एकखास एक्सप्रेशन होता है। जैसे खुश हैं तो स्माइल गुस्से में अपनी आइब्रोस को सिकोड़ना। 1960 में साइकोलॉजिस्ट टॉमकिंस इजर्ड और
How Emotions Are Made in Hindi
एकमैन ने छह बेसिक इमोशंस के फोटो बनाए। गुस्सा, डर, घिन, हैरानी, दुख, खुशी। यह फोटो ऐसे बनवाए गए थे कि इमोशंस का सबसेक्लियर एक्सप्रेशन दिखे। इन फोटो के जरिए टेस्ट किया गया कि लोग फेस एक्सप्रेशन से इमोशन पहचान सकते हैं या नहीं।टेस्ट सब्जेक्ट्स को फोटो और इमोशन वर्ड्स दिए जाते थे और उन्हें मैच करना होता था। एक फेमस स्टडी में एक मैन न्यू गिनी गएजहां लोकल लोग भी आसानी से फोटोज को इमोशन वर्ड से मैच कर पाए। इसी आधार पर यह मान लिया गया कि इमोशन एक्सप्रेशनंस यूनिवर्सलहै। यानी हर कोई चेहरों से इमोशन पहचान सकता है। कुछ साइंटिस्ट को यह तरीका बहुत सब्जेक्टिव लगा। इसलिए उन्होंने फेशियलइलेक्ट्रो मायोग्राफी फेशियल ईएमजी नाम की टेक्निक निकाली जिसमें चेहरे की मसल मूवमेंट्स इलेक्ट्रोड से मापी जाती है। अगर कोई गुस्से में है
तो फेशियल ईएमजी में वही पैटर्न हर बार दिखना चाहिए। लेकिन असल में ईएमजी से पता चला कि चेहरे की मसल मूवमेंट्स हर इमोशनमें एक जैसी नहीं होती। यह पैटर्न्स बहुत वेरीरी करते हैं। बस इतना ही पता चलता है कि फीलिंग्स अच्छी हैं या बुरी। यहमूवमेंट्स क्लासिकल फोटो से भी मैच नहीं करती। इसी तरह दूसरी टेक्निक फेशियल एक्शन कोडिंग में भी यही देखा गया कि मसलमूवमेंट्स हर बार मैश नहीं होती। यहां तक कि बच्चों में भी जब उन्हें डराया गया या गुस्सा दिलाया गया। उनके फेस मूवमेंट्समें कोई खास फर्क नहीं था। लेकिन जब बड़ों ने इन वीडियोस को देखा तो उन्होंने कॉन्टेक्स्ट से इमोशन पहचानलिया। चेहरा देखे बिना भी। यानी असली मायने कॉन्टेक्स्ट में है ना कि सिर्फ चेहरे में। न्यूबर्न बच्चे अलग-अलग फेस मूवमेंट्स तोकरते हैं, लेकिन बड़े लोगों की तरह क्लियर एक्सप्रेशनंस नहीं दिखाते। दूसरे साइंटिस्ट ने भी प्रूव किया कि हम
ज्यादा इंफॉर्मेशन कॉन्टेक्स्ट से लेते हैं। जैसे अगर किसी ने गुस्से वाला चेहरा बनाया है लेकिन उसके हाथ में डायपर हैगंदा डायपर तो लोग उसको घिन यानी डिसगस्ट समझेंगे ना कि गुस्सा। असल में जो फोटो क्लासिकल एक्सप्रेशनंस केमाने जाते हैं वह असली जिंदगी में नहीं दिखते। साइंटिस्ट ने खुद से यह फोटो बनवाए और मान लिया कि यह यूनिवर्सल है। लेकिन यह असल
में कल्चरल स्टीरियोटाइप्स हैं। बच्चे भी स्कूल में एंग्री या सैड के लिए ऐसे ही फेस सीखते हैं। यह शॉर्टकट्स हैं जोकार्टूनस, एड्स, डॉल्स, इमोजी वगैरह में दिखते हैं। इसी को किताबों और थेरेपी में भी पढ़ाया जाता है। लेकिन रियलिटी में हरइमोशन के लिए कोई खास फेस एक्सप्रेशन नहीं है। फेशियल मूवमेंट्स कई बार सोशल कम्युनिकेशन के लिए भी होते हैं। कौन साफेस मूवमेंट कब क्या मतलब देता है? यह बहुत हद तक कॉन्टेक्स्ट पर डिपेंड करता है। चेहरे में इमोशंस की फिंगरप्रिंट ढूंढनेमें जब काम नहीं बना तो मैंने सोचा शायद शरीर में कुछ ऐसा मिलेगा जैसे हार्ट रेट, ब्लड प्रेशर या दूसरे बॉडी फंक्शन।सबसे फेमस स्टडी 1983 में हुई थी। जिसमें लोगों को मशीन से जोड़ा गया और उनकी हार्ट रेट, स्किन टेंपरेचर, पसीने वगैरह मापे
गए। अलग-अलग इमोशंस जैसे गुस्सा, डर, दुख, खुशी वगैरह लाने के लिए सब्जेक्ट्स को खास फेस पोश करने को कहा गया। जैसे दुखी होनेके लिए आइब्रोस को सिकोड़ना, गुस्से के लिए मुंह बनाइए। इसके बाद उनके शरीर में आए बदलाव रिकॉर्ड किए गए।इस स्टडी के नतीजों में लगा कि हर इमोशन का बॉडी में एक खास पैटर्न है। जैसे गुस्से में उंगलियां गर्म हो जाती हैं।दिल तेज धड़कता है वगैरह। लेकिन असल में यह पैटर्न सिर्फ गुस्से के लिए थोड़े अलग दिखे। बाकी इमोशंस में कोई खास फर्क नहीं
था। दूसरी बात यह भी हो सकता है कि सब्जेक्ट्स को पहले से पता था कि कौन सा पोज किस इमोशन का है। तो उनके शरीर मेंवही बदलाव आ गए। जब वही एक्सपेरिमेंट अफ्रीका के एक ट्राइब के साथ किए गए तो वहां के लोगों में यह बदलाव दिखे ही नहीं।इसके बाद और भी कई रिसर्च हुई। कभी डरावनी फिल्में, कभी सैड मूवीज और सब्जेक्ट्स के शरीर की एक्टिविटी मापी गई। नतीजों में
How Emotions Are Made in Hindi -हमेशा बहुत वेरिएशन मिला। कोई पक्का पैटर्न नहीं निकला। कई बार एक ही इमोशन जैसे गुस्सा या डर अलग-अलग लोगों यास्टडीज में अलग पैटर्न दिखाते हैं। यानी इमोशंस के कोई भी यूनिवर्सल बॉडी फिंगरप्रिंट नहीं मिले। साइंटिस्ट ने बहुत
सारी स्टडीज के डाटा को मिलाकर मेटा एनालिसिस भी किया। एक बड़े मेटा एनालिसिस में20 से ज्यादा स्टडीज और 22,000 लोगों का डाटादेखा गया। लेकिन फिर भी कोई पक्का बॉडी फिंगरप्रिंट नहीं मिला। हर इमोशन के लिए शरीर का अलग-अलग रिस्पांस हो सकता है।
एक्सपेरिमेंट्स में जब लोगों को मुश्किल काम दिया गया या सबके सामने बेइज्जती की गई तो सबने अलग-अलग तरीके से रिएक्ट किया।कोई गुस्से में चुप रहा, कोई रोया, कोई नाराज होकर बैठ गया। हर किसी की बॉडी का रिस्पांस भी अलग था। यहां तक कि बॉडी
पोश्चर बदलने से भी बॉडी के अंदर का रिएक्शन बदल जाता है। इन सब बातों का मतलब यह है कि अलग-अलग स्टडीज और लोगों मेंइमोशन के बॉडी रिस्पांस अलग-अलग होते हैं। यानी वेरिएशन नॉर्मल है। यह बात फिजियोलॉजिस्ट पहले से जानते हैं। इतनी सारी कोशिशों के बाद भी एक भी इमोशन के लिए कोई पक्का बॉडी फिंगरप्रिंट नहीं मिला। मेरे फेस और बॉडी दोनों में कोशिश करने के बाद मुझे समझ आया कि इमोशन कोई एक चीज नहीं है। बल्कि इमोशन की कैटेगरी में बहुत वेरिएशन होता है। जैसे गुस्से मेंकोई चिल्लाता है, कोई शांत रहता है, कोई मजाक में जवाब देता है। हर बार बॉडी का रिस्पांस बदल सकता है। असल में यह सब पपुलेशन थिंकिंग जैसा है। जैसे डार्विन ने बताया था कि किसी भी कैटेगरी में सब अलग-अलग हो सकते हैं। कोई एक पक्का पैटर्ननहीं होता। फिर मैंने ब्रेन में इमोशन के फिंगरप्रिंट ढूंढने की कोशिश की। साइंटिस्ट ने देखा है कि अगर किसी इंसान के ब्रेन के किसीहिस्से को नुकसान हो जाए तो क्या कोई इमोशन गायब हो जाती है? खासकर फियर के लिए। हमेशा से माना गया है कि फियर के लिए
दिमाग के अमगिला हिस्से में डर रहता है। कुछ पुराने एक्सपेरिमेंट्स में बंदरों की अमगिला निकाल दी गई तो वह डरना बंद करदिए। इंसानों में भी एसएम नाम की एक महिला को अमगिला डैमेज है और उसे डर महसूस नहीं होता था। लेकिन जब साइंटिस्ट ने एसएम को और टेस्टकिया तो पता चला कि कुछ सिचुएशन में वह भी डर सकती है। जैसे CO2 सांस में लेने पर वह पैनिकिक हो गई। इसी तरह दो जुड़वा बहनों
को भी यह डैमेज था। लेकिन दोनों में डर अलग-अलग तरीके से दिखा। यानी ब्रेन में भी डर या किसी और इमोशन का कोई एक फिक्सहिस्सा नहीं है। बल्कि ब्रेन में अलग-अलग नेटवर्क्स मिलकर इमोशन बनाते हैं। न्यूरो साइंस में इसे डीजे जेनेरसी कहा जाता है। मतलब एक इमोशन
के लिए ब्रेन में कई अलग-अलग रास्ते हो सकते हैं। और एक ही ब्रेन पार्ट कई काम कर सकता है। मेरी लैब में जब हमने ब्रेनस्कैन करके लोगों के इमोशंस देखे तो हर बार ब्रेन का पैटर्न बदलता मिला। महिलाओं में एक ब्रेन एरिया एक्टिव था। मर्दों में
दूसरा यानी एक ही मोशन के लिए ब्रेन का पैटर्न भी अलग-अलग हो सकता है। फिर एफ एमआरआई जैसे ब्रेन इमेजिंग तरीकोंसे देखा गया कि अमेगिला इमोशंस के साथ-साथ नए इमोशनल कामों जैसे नई चीज सीखना, दर्द महसूस करना इनमें भी एक्टिव होती है। जबसारे स्टडीज के डाटा को एक साथ देखा गया तो पता चला कि कोई भी ब्रेन एरिया किसी एक इमोशन के लिए पक्का फिंगरप्रिंट नहींबनाता। इसलिए अगर कोई सॉफ्टवेयर ब्रेन स्कैन देखकर बता दे कि यह गुस्सा है या डर है तो वह बस सारे डाटा का एवरेज निकाल रहा है।
असल में कोई एक यूनिक पैटर्न नहीं है। यह पैटर्न एक स्टैटिस्टिकल एवरेज होता है। असली ब्रेन में नहीं मिलता।इतना सब देखकर मुझे समझ आया कि हमें इमोशंस के लिए नई थ्यरी चाहिए। इमोशन का कोई एक फिक्स पैटर्न नहीं है। बल्कि हरइमोशन कैटेगरी के अंदर बहुत वेरिएशन है। असली समझ तभी आएगी जब हम इस वेरिएशन को सीरियसली लें। तभी हम इमोशंस और खुद कोसही से समझ पाएंगे। बुक में ऑथर ने कुछ ब्लैक ब्लब्स दिखाए हैं और कह रहे हैं कि अगर आप इन ब्लैक ब्लब्स को पहली बार देख रहे हैं तो दिमाग इन्हें समझने की कोशिश कर रहा है। आपके ब्रेन में विजुअल कॉर्टेक्स लाइनें और एजेस प्रोसेस कर रहा है। और मैग्डिलाएक्टिव हो जाती है क्योंकि नया इनपुट है। बाकी ब्रेन पार्ट्स आपके पुराने एक्सपीरियंस चेक कर रहे हैं। How Emotions Are Made in Hindi